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विवेक दत्त मथुरिया


हमारी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता एक स्वांग से ज्यादा कुछ भी नही है। चिल्लाते रहो कि हम ब्रजवासी है, कन्हैया के सखा हैं, अंगी संगी है, तो फिर जवाब दो तुम्हारी आँखों के सामने ब्रज बर्बाद कैसे हुआ और क्यों होने दिया? 
असल में तुम्हारी आस्था में अपने ठाकुर पर भरोसा ही नहीं था। क्योँ नहीं रोका टोका उन लोगों को जो रावण जैसी आसुरी शक्तियों के साथ साधु भेष में ब्रज में आये। इन्ही आसुरी शक्तियों को आज बाज़ारवादी शक्ति कहते हैं। इन शक्तियों ने ब्रजवासियों के लालच को जगाया और भौतिक कामनाओं को दान, दक्षिणा और भंडारे रूपी खाद पानी दिया औऱ यहीं से ऐसे फिसले कि आजतक संभल नहीं सके, लालच और कामनाओं की फिसलन है, जो रुकने का नाम नहीं ले रही।
 भागवत धर्म के संस्थापक, गोपालक के रूप में कृषक संस्कृति के महानायक के रूप में कंस के सामन्तवाद और देवताओं के राजा इंद्र की सरमायेदारी को समाप्त कर ब्रज लोक धर्म की स्थापना करने वाले श्रीकृष्ण  की लीला भूमि को से जुड़े छोटे से सांस्कृतिक ब्रजांचल को हम आजाद भारत में विशेष सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप मे संरक्षित नहीं करा सके। हमने इस नजरिये से देखने समझने की कोशिश ही नही की। क्योंकि हमारी आँखों पर बाजार ने लोभ लालच और मुनाफे का चश्मा जो चढ़ा रखा है।

ब्रजवासियों ने ब्रज की प्रेम संस्कृति पर आधारित इस क्षेत्र की पहचान को अक्षुण बनाये रखने के नजरिए कभी सोचा ही नही। 
जिस ब्रजभाषा ने हिंदी को जो उच्चता प्रदान की वह किसी से छिपा नहीं है। इतनी सम्रद्ध संस्कृति आज अपनी पहचान और अस्तित्व के लिए आख़री संघर्ष करती दिख रही है।

वहीं इसी देश मे ऐसे कई राज्य है जिनकी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधानों के तहत संरक्षण दिया हुआ है। इन राज्यो में देश के अन्य राज्यों के लोग एक इंच जमीन नहीं खरीद सकते। फिलहाल 370 खत्म होने के बाद जम्मू कश्मीर की बात छोड़ दी जाए तो अभी भी पूर्वोत्तर भारत में कई ऐसे राज्य हैं जहां अन्य दूसरे राज्यों के लोग सीधे तौर पर जमीन नहीं खरीद सकते हैं या उन पर कुछ प्रतिबंध होते हैं। ये प्रतिबंध आमतौर पर जनजातीय आबादी के हितों की रक्षा करने, उनकी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने और भूमि के अंधाधुंध व्यवसायीकरण को रोकने के उद्देश्य से लगाए जाते हैं।
मुख्य रूप से ये राज्य हैं:
नागालैंड: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371A के तहत, नागालैंड में गैर-निवासियों द्वारा भूमि खरीदने पर प्रतिबंध है। यहाँ केवल राज्य के स्वदेशी निवासी ही भूमि खरीद सकते हैं।
 सिक्किम: अनुच्छेद 371F के तहत सिक्किम को विशेष प्रावधान प्राप्त हैं, जो बाहरी लोगों द्वारा भूमि या संपत्ति की खरीद और बिक्री पर रोक लगाते हैं। सिक्किम में केवल स्थानीय निवासी ही भूमि खरीद सकते हैं, और जनजातीय क्षेत्रों में केवल जनजातीय सदस्य ही ऐसा कर सकते हैं। हालाँकि, औद्योगिक इकाइयों की स्थापना के लिए बाहरी लोगों को कुछ शर्तों के साथ भूमि खरीदने की अनुमति हो सकती है।
अरुणाचल प्रदेश: अरुणाचल प्रदेश में भी बाहरी लोगों और गैर-जनजातीय निवासियों को संपत्ति रखने की अनुमति नहीं है। यहाँ कृषि भूमि का हस्तांतरण केवल सरकारी अनुमोदन के बाद ही होता है।
मिजोरम: अनुच्छेद 371G के तहत मिजोरम को भी विशेष अधिकार प्राप्त हैं, जिसके कारण बाहरी लोग यहाँ भूमि नहीं खरीद सकते।
मेघालय और त्रिपुरा: संविधान की छठी अनुसूची के तहत असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन की व्यवस्था की गई है। इन क्षेत्रों में स्वायत्त परिषदें हैं जो बाहरी लोगों द्वारा भूमि खरीदने पर प्रतिबंध लगाती हैं।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इन नियमों में कुछ अपवाद या विशेष परिस्थितियाँ हो सकती हैं, खासकर औद्योगिक या विकास परियोजनाओं के लिए। हालांकि, सामान्य नियम यह है कि इन राज्यों में भूमि खरीदने के लिए स्थानीय निवास और/या जनजातीय पृष्ठभूमि होना आवश्यक है।
यह विशेष दर्जा ब्रज को भी मिलना चाहिए था, इस दिशा में सोचने का मौका तब मिलता जब भोग, भंडारे, दान, दक्षिणा से फुर्सत मिलती।

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