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गिरकर उठना,उठकर चलना यह क्रम है संसार, कर्मवीर को फर्क ना पड़ता किसी जीत या हार का.. यह पंक्तियां राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री एवं लगातार  08 बार के विधान सभा चुनाव जीतने वाले प. श्याम श्याम सुंदर शर्मा के जीवन पर सटीक साबित होती हैं जो वर्तमान में विधायक का चुनाव हारने के बाद भी बुलंद हौसलों के साथ 09 बार जीत का परचम लहराने के लिए संकल्पबद्ध नजर आ रहे हैं ।                                

 उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद की मांट तहसील के छोटे से गांव पचहरा में पिता स्वतंत्रता सेनानी पंडित लोकमणि शर्मा एवं माता बादामी शर्मा के घर 15 जुलाई 1952 को  जन्मे  श्याम सुंदर की प्रारंभिक पढ़ाई गांव के सरकारी प्राइमरी स्कूल में हुई। इसके बाद   08तक की पढ़ाई निकटवर्ती अलीगढ़ जनपद के सरकारी जूनियर हाई स्कूल शिवाला में सम्पन्न हुई। इसके बाद कक्षा 09 में मथुरा के के.आर. इंटर कालेज मथुरा में हुई जहां 10 वीं की पढ़ाई के दौरान छात्र हुड़दंग के कारण 04 दोस्तों के साथ स्कूल से बाहर निकाल दिया गया। इसके बाद तमाम प्रयासों के बाद    चंपा अग्रवाल इंटर कालेज में दाखिला हो सका। बचपन से छात्र राजनीति के जुनून के कारण मथुरा में पढ़ाई के दौरान छात्र संघ के अध्यक्ष पूर्व मंत्री सरदार सिंह का एक छात्र ने सिर फोड़ दिया जिसके कारण छात्रों का आंदोलन पूरे जनपद में भड़क उठा इसकी कमान श्याम सुंदर शर्मा ने संभाली जिसमें तत्कालीन सीओ सिटी को मथुरा कोतवाली में चूड़ियां तक पहना दी गईं। इसके बाद रिफाइनरी को लेकर  आंदोलन खड़ा हुआ जिसमें श्री ने बढ़चढकर भाग लिया जिसमें कई बार लाठी चार्ज के साथ साथ अनेक बार जेल जाना पड़ा । श्री शर्मा को राजनीति का ऐसा चस्का लगा कि उनकी एम ए के बाद उनकी लॉ आदि की पढ़ाई छूट गई। कहने को तो उनके पिता लोकमणि शर्मा गांव में वैद्य का कार्य कर परिवार का पालन पोषण कर रहे थे लेकिन गांव की जनता ने उन्हें अनेक बार प्रधान, सरपंच चुनकर उन्हें गांव की सेवा का मौका दिया। छात्र जीवन से ही संघर्ष शील श्री शर्मा ने अपने पिताजी को 1972 में ब्लॉक प्रमुख बना दिया, 1977 में कांग्रेस की टिकिट दिलाकर मांट विधान सभा से विधायक का चुनाव लड़ाया लेकिन उनके पिता चुनाव हार गए। इसके बाद पुनः 1980 में कांग्रेस से विधायक का चुनाव लड़वाया जिसमें उनके पिता पहलीवार विधायक बनने में सफल रहे। इसके बाद 1985 में विधायक का चुनाव लड़वाया तो राजा मानसिंह हत्याकांड की लहर के चुनाव हार गए। इसके बाद 1989 में विधान सभा चुनाव कांग्रेस पार्टी की टिकिट पर मांट विधान सभा से चुनाव मैदान में कूद पड़े और पिता की हार का बदला लेते हुए जीत दर्ज की। इसके बाद 1991 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में जबरदस्त राम लहर के बाबजूद भी चुनाव जीतने में सफल रहे। जीत का यह सिलसिला 1993,1996,2002,2007,2012,2017 तक लगातार जारी रहा।

श्री शर्मा के 09 वीं बार जीतने के ख्वाब को भाजपा से पहली बार विधान सभा चुनाव लड़ने वाले युवा  राजेश चौधरी ने तोड़कर परास्त कर दिया। जिससे पहली बार वह राजनीति के दंगल से बाहर हुए है।।उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में लगातार 08 बार जीत का परचम लहराने वाले श्याम सुंदर शर्मा लगातार 08 साल तक प्रदेश के केबिनेट मंत्री रहे हैं जिसमें उच्च शिक्षा , युवा कल्याण,खेलकूद, होमगार्ड, संस्कृति आदि जैसे महत्वपूर्ण विभागों में जिम्मेदारी संभालकर जनता एवं युवाओ के अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए हैं।श्री शर्मा ने अपने पिता,पत्नी सुधा शर्मा को जिला पंचायत अध्यक्ष भी बनाने मे सफल रहे हैं बल्कि अपने पुत्र डा. ललित शर्मा जो को कॉपरेटिव बैंक एवं सहकारी संघ अध्यक्ष भी बनाने मे सफल रहे हैं। लेकिन श्री शर्मा सांसद बनने के लिए 1996 एवं 2009 में लोक सभा चुनाव लड़े और दोनों ही बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा। लेकिन वर्ष 1989 से 2017 तक लगातार विधान सभा चुनाव जीतकर वह जनपद की राजनीति के चाणक्य बन गए। यही कारण रहा चाहे जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव हो अन्य विधान सभाओं का चुनाव हो या फिर जिला पंचायत अध्यक्ष, सदस्य,ब्लॉक प्रमुख ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत बैंक, संघ के चुनाव हों हर चुनाव में प्रत्याशी चाहे किसी पार्टी का हो या निर्दलीय जीत के लिए श्री शर्मा का आशीर्वाद लेने में पीछे नही रहे। अनेक बार सत्ता धारी पार्टियों ने श्री शर्मा को हराने के लिए साम, दाम,दंड, भेद की नीतियों का भरपूर प्रयोग किया लेकिन उनकी रणनीति के सामने कोई सफल नही हो सका। और वह हर बार चुनाव जीतने में सफल रहे। 1991 के चुनाव में जबरदस्त रामलहर हो या फिर 2017 में सपा की सरकार के दौरान जिसमें मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नजदीकी संजय लाठर को सपा से चुनाव लड़ाया गया जिसमें मुख्यमंत्री सहित सपा ने लाठर को जिताने के लिए पूरी ताकत झोंक दी लेकिन श्याम के जनबल के सामने हार का मुंह देखना पड़ा।

08 अंक का संयोग
श्याम सुंदर शर्मा के राजनीतिक जीवन में 08 के अंक का अद्भुत संयोग रहा है जिसमें वह आंदोलन के दौरान 08 बार जेल गए। 08 साल तक ही वह लगातार उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे  , 08 बार ही वह मांट विधान सभा से लगातार विधायक निर्वाचित हुए हैं खास बात ये है कि 08 बार के बाद ना वह कभी जेल गए ना  ही वह 09 वीं बार विधायक बन सके और ना ही 09 वीं साल मंत्री बन सके यही नही वर्ष 1996 हो या 2009 दोनों ही बार श्री शर्मा को लोकसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा और वह आज तक सांसद बनने का सपना पूरा नही कर सके हैं। अब उनका भविष्य में भी लोक सभा चुनाव लड़ने का विचार नही है लेकिन वह 2027 में विधान सभा चुनाव पूरी ताकत से लड़ने और जीतने का संकल्प व्यक्त करते हैं। और 09 वीं बार विधायक बनकर पुराने कीर्तिमान को तोड़ने का संकल्प दोहराते हैं।

चेलों ने गुरु को पछाड़ दिया..
गुरू गुड रह गए ,चेले शक्कर हो गए.. यह कहावत श्याम सुंदर शर्मा के राजनीतिक जीवन पर सटीक साबित हुई है मथुरा लोकसभा सीट से तीन बार सांसद चुने गए एवं वर्तमान राजसभा सांसद चौधरी तेजवीर सिंह को श्री शर्मा ने बैंक अध्यक्ष बनाकर राजनीति में प्रवेश कराया ।लेकिन लोक सभा चुनाव  में तेजवीर सिंह के सामने ही श्याम सुंदर शर्मा को हार का मुंह देखना पड़ा। इसी तरह मांट विधान सभा क्षेत्र के नौहझील ब्लॉक प्रमुख के चुनाव में वर्तमान विधायक राजेश चौधरी की पत्नी सुमन चौधरी को श्री शर्मा ने ब्लॉक प्रमुख बनवाकर अपने विरोधियों को पटखनी दी। लेकिन अगली बार के ब्लॉक प्रमुख चुनाव में राजेश चौधरी की पत्नी ने श्याम समर्थक प्रत्याशी को परास्त कर पुनः ब्लॉक प्रमुख  पद कब्जा किया। बल्कि 2022 के विधान सभा चुनाव में राजेश चौधरी ने भाजपा की टिकिट पर चुनाव लड़कर 08 बार के विजेता श्याम सुंदर शर्मा को परास्त कर जीत का परचम लहरा दिया। और राजनीति के दंगल से बाहर कर दिया। इसी तरह जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में श्री शर्मा अपने पुत्र डा.ललित शर्मा को जिला पंचायत अध्यक्ष बनाने भले ही सफल नही हो सके। लेकिन अगले चुनाव में भाजपा के चौधरी  किशन सिंह जो कि श्री शर्मा के बहुत नजदीकी माने जाते हैं को समर्थन देकर उन्हें जिला पंचायत अध्यक्ष का ताज पहना दिया ।2027 के विधान सभा चुनाव में किसकी जीत किसकी हार होगी ये तो अभी वक्त तय करेगा लेकिन भाजपा विधायक और श्याम दोनों के बीच ही घमासान होने के आसार नजर आ रहे हैं।

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राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले श्याम सुंदर शर्मा विधायक का चुनाव हारने और बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाए जाने के बाद भले ही विरोधी उनका राजनीतिक भविष्य अंधकारमय मान रहे हों लेकिन उनके निवास पर लगने वाले जनता दरबार में आज भी भीड़ का कारवां नजर आता है जानकार कहते हैं कि आज भी अनेक सत्ताधारी विधायक ,मंत्री नेताओं के यहां आने वाली जनता के मुकाबले श्री शर्मा के यहां बहुत ज्यादा भीड़ नजर आती है ,बल्कि उनकी सभाओं और कार्यक्रमों में भी जनबल नजर आता हैजिसे देखकर लगता है कि  राजनीति में  उनकी पुनः वापिसी को रोकना मुश्किल है जब निवास पर एकत्रित  कुछ लोगों से आने का  कारण पूछा गया तो कहा कि... जातिवाद पूछे नही,पूछे केवल काम,ऐसा नेता एक है जिसका नाम है श्याम .. ये नारा हर चुनाव में भी गूंजता रहा है जो साकार होता रहा है। अगले चुनावों में ये कितना साकार होगा। यह भविष्य की बात है लेकिन उनके समर्थकों के हौसले बुलंद हैं।

राजनीति में श्याम के परिवार का भी रहा है दबदबा..
श्याम सुंदर शर्मा भले ही राजनीतिक परिवार से नही रहे लेकिन राजनीत में उन्होंने अंगद की तरह पैर जमा दिया।  छात्र जीवन में अपने पिता को ब्लॉक प्रमुख बनवा दिया बल्कि 1974 - 1975 में  एनएसयू आई कांग्रेस के अध्यक्ष बनकर कॉलेज में विज्ञान एसोशिएशन सहित कॉलेज के जनरल सेकेट्री के पद पर कब्जा कर लिया। और रिफाइनरी के आंदोलन में कूद गए आंदोलन को तूल देने पर प्रशासन ने जहां श्याम सुंदर के रिफायनरी क्षेत्र के 07 किलोमीटर एरिया में आने पर प्रतिबंध लगा दिया बल्कि 7 क्रिमिनल एक्ट के तहत उत्तर प्रदेश पहली बार लगाया गया । बल्कि उन्हें अनेक बार गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। जिसके परिणाम स्वरूप उनके पिता लोकमणि  शर्मा को कांग्रेस ने टिकिट दी लेकिन चुनाव पुनः 1980 में टिकिट देने पर उनके पिता चुनाव जीत गए लेकिन 1985 वह चुनाव हार गए। 1989 में श्याम सुंदर शर्मा ने कांग्रेस से विधायक का चुनाव लड़ा जिसमें जीत दर्ज की लेकिन पश्चिम उत्तर प्रदेश में जीतने वाले कांग्रेस के एक मात्र विधायक थे। इसके बाद कभी वह लोकतांत्रिक कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, तिवारी कांग्रेस, कभी बसपा तो कभी निर्दलीय रूप से जीत का परचम फहराते रहे। यही कारण है कि आज भी वह किसी दल में ना होते हुए भी निर्दलीय रूप से जनबल के सहारे चुनाव जीतने का दावा कर रहे हैं। श्री शर्मा से यह पूछे जाने पर कि वह किस दल से आगामी चुनाव लड़ेंगे तो  कहा कि कोई भी राजनीतिक दल आज तक उनका वैशाखी नही रहा उनके लिए जनता ही सबसे बड़ी बैसाखी है उसी के सहारे फिर से चुनाव की वैतरणी पार करेंगे।
73 वर्ष की उम्र आज भी है चुनाव जीतने का जोश...
8 बार विधानसभा चुनाव सहित अन्य चुनाव जीतकर विरोधियों के दांत खट्टे करने वाले श्याम सुंदर शर्मा ने कभी खुशी कभी गम का माहोल भी राजनीति में देखा है। उन्हें दो बार लोकसभा चुनाव, दो बार विधानसभा चुनाव तथा दो बार पिताजी की हार के अलावा उनके पुत्र को भी हार का सामना करना पड़ा है। इसके बावजूद भी श्याम सुंदर शर्मा ने राजनीति का दंगल नहीं छोड़ा है और एक बार फिर वह 73 वर्ष की उम्र में भी विरोधियों के सामने पूरे जोश के साथ ताल ठोकते हुए दिखाई दे रहे हैं। 

सफलता के सूत्र - क्या कहते हैं श्याम सुंदर शर्मा ..                       
* राजनीति में विनम्र शालीनता की पराकाष्ठा मूल मंत्र है।                   
जनता से कभी दूरी नही रखनी चाहिए उसकी सेवा में हर समय तत्पर रहना जनप्रतिनिधि का पहला कर्तव्य होना चाहिए।            
घमंड नाश की निशानी है चाहे कितने भी बड़े पद पर पहुंच जाओ लेकिन कभी घमंड नही करना चाहिए।                            
राजनीति में हार जीत होती रहती है जीत पर इतराना नही चाहिए और हार से कभी घबड़ाना नही चाहिए।

नोट - यह साक्षात्कार श्री श्याम सुंदर शर्मा से व्यक्तिगत बातचीत पर आधारित हैै। इसे कहीं प्रसारित व कॉपी करना पूर्ण रुप से वर्जित है।

फोटो शूट- सोशल मीडिया

 

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